Wednesday, 20 July 2016

तेरे बारे में क्या लिखु और कहु भी क्या कहु आखिर ...
तू वो एहसास है जिसे सोच कर भी मुस्कुरा उठता हूं मैं...
"ना जाने क्या वो *कशिश* है तुझमें,
बिन डोर *तू* खिंचे जाये मुझे…

हुँ गुम मैं इन *नशीली आँखो* में,
*बेखुद* ही सही ना *होंश* आये मुझे…

*दिल* क्यो करता है *दर्द* का सौदा ,
*राज़* ये क्या है कोई तो बताये *मुझे…*

*दिल्लगी* है या *ऐतबार* है ये,
ये *आशिकी* कोई तो *समजाये* मुझे…

भरी *महफिले* लगे अब सुनी-सी,
*तुम* बिन कुछ ना *भाये* मुझे…

ना रहा करो *रूठकर* हमसे तुम,
*याद* तेरी हरपल *सताये* मुझे…

❤✍🏼से

" *कसूर* ना उनका है ना मेरा,
हम *दोनो* रिश्तों की रसमें *निभाते* रहे,
वो *दोस्ती* का *ऐहसास* जताते रहे,
हम *मोहब्बत* को *दिल* में *छुपाते* रहे.."

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